काश
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काश ये मुख़्तसर सी मुलाकात ही न होती ,
तो हौसलों को बुलंद करने की इजाजत ही न होती
काश हमारी भी जुबान न होती ,
तो कुछ कहके सुनाने की इबादत ही न होती
काश कलम में हमारे स्याही न होती ,
कुछ लिखके बताने की हसरत ही न होती
------------निशाँ
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