शनिवार, ८ सप्टेंबर, २०१२


कविता -आर्जव 
असंख्य आर्जवा नि  नभास  भेदले असावे 
 आर्त  साद घालशील  मनी ताडले  असावे  

विरह  नित्याचीच   गाथा  ,भेट  परिपाठ घेते
तु दुरस्थ बरी   , जणू  भाळी गोंदले  असावे 

 जरी  मुठीत  बंदिस्त  केले जीर्ण  कल्पित  
 एकाकीपणा  बहाल करीत   निसटले  असावे 

गायले  भुपाळी  दशदिशा पादाक्रांत केल्या 
तूर्तास  बसली  वाचा  , गुपित जाणले  असावे
 
वादळाशी ग  सख्य माझे   ,गर्वाने  उडाले   
क्रूर चेष्टेत  त्याने पंखच   छाटले असावे 
                      
                        मनिषा बांगर -बेळगे 


 माझा पहिला अभंग-

|| लाभले संस्कार | आई बाप थोर ||
|| अज्ञानी मी पोर  |गुरु विना ||

||जमा केली माया | जन्म गेला वाया 
||उद्धार कराया| गुरु माझा ||


||येई डोळा पाणी | स्मरे गुरु  वाणी ||
||यावे आठवांनी  | गुरु राज ||

  ||तैरे अधांतरी|मी  भवसागरी||
||न्यावे   पैलतीरी | गुरु स्वामी  ||

||कठोरता बरी  | भेद नसे परी ||
||निर्मळ अंतरी | गुरुवर्य||

||नमन करिते  | चरण पूजिते  ||
||गुरूस  स्मरते  | पौर्णिमेशी  ||

---मनिषा बांगर -बेळगे 



ध्येय 
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काळ आला 
 वेळ गेली 
परत फिरा 
सावल्यानो  
विरह फुलांचा 
ह्रदयास 
पीळ घाली

ऋण घ्यावे 
ऋण द्यावे 
विसरू नका 
भावनानो 
कधीच उपकार
जरी नाती 
जून झाली  

शब्द दिले 
शब्द घेतले 
आठवू नका 
वेदनानो
त्याच  जखमा 
जरी खपली 
निघाली 

वारे सुटले 
रान पेटले 
पळवू  नका 
वादळानो 
असंख्य गुपिते 
धरत्रीच्या 
गर्भातली 

प्रकाश आला 
अंधार गेला 
भिवू नका 
दिव्यानो 
 जपा वात 
 बघा आताच     
 रात्र झाली

उणीव उरली 
जाणीव झाली   
थकू नका 
पावलानो
ध्येय गाठा
जरी दिशा 
बदलली  
~~~~~~~~~
मनिषा बांगर -बेळगे 
       दुबई 




भास 
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रानात शीळ  आली
कानात शीळ आली 
मनात शीळ आली 
ध्यानात शीळ आली 
हळूहळू श्वास माझा
 मलाच  शीळ घाली 

अंगणात भास झाला 
घराचा तो खास झाला 
वेदनांचा ऱ्हास झाला
उष्ण  श्वास झाला  
हळूहळू भास त्याचा 
 माझाच दास झाला 
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 --मनिषा बांगर -बेळगे ,१/ ९ /१२ 
       दुबई